Thursday, October 8, 2015

रिश्ता जो अनंत था, रूह से रूह का!

एहसास उन बातों का, तुम्हे क्यों नहीं होता !
शुरू  जो  साथ किया था सफर , दिल से दिल
या कहो रिश्ता जो अनंत था, रूह से रूह का !
इतनी फासला है की, कुछ भी सजग कुछ नहीं होता !
कुछ ज़मीन पर बने बंधनो ने, इतना बांध लिया है ,
कि अंदर की आवाज़ सुनाई हि  नहीं देती क्या ?
कभी ऐसा लगता है , मिलो का दूरी,
सालो का फासला कुछ भी नहीं,
क्योंकि दिल की आवाज़ कही तो पहुंची होगी !
पर कभी सब कुछ एक मिथ की तरह धुन्ध में खो जाता है।
क्या सच है , क्या सच था ?
क्या कुछ नित्य प्रेम जैसा कुछ होता भी है ?
एहसास तो है सत्यता का, जिसने बहाय नहीं ,
कुछ अन्त निहित स्पर्श किया था !
की कुछ तो है जो मिलो की दूरी , सालो का फैसला कुछ भी नहीं लगता!
यकीं हैं की कहीं तो दिल की कही तक आवाज़ पहुंची तो होगी!

अस्मिता १०/८/