Friday, September 30, 2011

कभी इस तरह से कभी किसी तरह से ,

कभी इस तरह से कभी किसी तरह से ,
यहीं सब जो तुमसे जुदा है , हर जगह हर तरह से
हर तरह से बस और सिर्फ तुमसे जुडा है...
बातो में जो पिछले दिनों की परछाई है , हर वो धुंधला सा एहसास है
कभी किसी तरह, कभी इसी तरह से , बस और सिर्फ तुमसे जुडा है..
दिन शुरू से हर पहर के अंत तक , जो रेखाओं से जुदा है 
कभी अलक्ष्य है, कभी प्रत्यक्ष अति स्पष्ट है
इसी तरह बस इसी तरह से , सिर्फ और सिर्फ तुमसे जुडा है...
ये तुम जानते हो, ये तुम्हे एहसास भी है... ये तुमसे न कभी जुदा था, 
न कभी अप्रत्यक्ष था  , कही अनंत की तलाश में बस अलग अलग सा,
जुदा जुदा सा रहा हो .. फिर भी सिर्फ तुमसे , हर तरह से सिर्फ तुमसे जुडा है ... 
-- अस्मिता सिंह

Friday, August 19, 2011

हम छुपाते है तो सब हालlत चहरे से बयाँ हो जाते हैं...

 हम छुपाते है तो सब हालlत चहरे से बयाँ  हो जाते  हैं...
वो सब बात बता कर भी हर बात छुपा जाते हैं
कुछ हालत ऐसे की बातो में बयां नहीं होते
भाव छुपान की हर कोशिश नाकाम नज़र आती है
शब्दकोष में कुछ कमी सी महसूस होती ही क्या है...
हर अभिव्यक्क्ति अपना रास्ता निज ही ढूंढ लेती है...
और जो हालात  संभ्रम में छुपाने की कोशिश की थी 
 वोह अधूरी कोशिश बनकर रह जाती है
चहरा जो हालात बयाँ करता था.. उसपर यह नाकाम कोशिश एक और भाव लगा देती है

- अस्मिता सिंह

Thursday, March 3, 2011

की किस तरह हवा के साथ बहते तिनके को कोई तो ठहराव मिले

की किस तरह हवा के साथ बहते तिनके को कोई तो ठहराव मिले...
इतनी दूर निकल आये की याद नहीं सफ़र शुरू कहाँ से किया था
की किस तरह पानी में मिलती जा रही तरंग को को उसका अपना एक बहाव मिले...
देखा तो अपने ही पल चिन्ह पहचाने में नहीं आये 
किसी के रास्तो पर गुमसुम से चले जा रहे थे ...
की आज पीछे नज़र घुमाई है  और किस तरह आप में धूमिल होते अहसास को कोई पहचाना सा भाव मिले..
अजीब अवलंबित सफ़र में भागते हमसफ़र की तरह एक लम्बा सफ़र तय तो केर लिया है  ...
की उसे भी आज रुक कर एक नयी हवा का हल्का सा अनुभाव मिले..
की किस तरह हवा के साथ बहते तिनके को कोई तो ठहराव मिले...

-अस्मिता सिंह
०३.०३.२०११