Thursday, October 6, 2016

अहित आभाव ज़िन्दगी का

अहित आभाव ज़िन्दगी का 

क्योंकर हर अहित का सामना होता है 
जो सच नहीं  उसका दिखावा खूब होता है !

अयोग्य का सर्वोपरि विस्तार है।
जो योग्य है , उसका हर जगह दमन है !

अहित आभाव ज़िन्दगी का 

उदय तो उसका भी होता है ,जो कभी किसी का अभिप्राय न बना 
अवसान एक दिन हर अवधि का निशित ही होता है.. 

समय है जो आज किसी का वैरी  है , कल किसी का सहचर था  !
इसी तरह अयन को मन से न लगा बैठो !
जो इजाज़त लेकर कभी आया ही नहीं,  वह जाने  के लिए सम्मति क्यों  लेगा !!

अहित आभाव ज़िन्दगी का 

जिस तरह हर  लहर एक दूसरे से उतनी ही जुदा है !
जितना वह एक अंबुधि का अपरित्याज्य हिस्सा है !
अक्सर जटिल चट्टानो से मिल , अस्त्तिव को बैठती है !

अहित आभाव ज़िंगदगी का

अस्मिता सिंह 
१०/६/२०१६ 









Thursday, October 8, 2015

रिश्ता जो अनंत था, रूह से रूह का!

एहसास उन बातों का, तुम्हे क्यों नहीं होता !
शुरू  जो  साथ किया था सफर , दिल से दिल
या कहो रिश्ता जो अनंत था, रूह से रूह का !
इतनी फासला है की, कुछ भी सजग कुछ नहीं होता !
कुछ ज़मीन पर बने बंधनो ने, इतना बांध लिया है ,
कि अंदर की आवाज़ सुनाई हि  नहीं देती क्या ?
कभी ऐसा लगता है , मिलो का दूरी,
सालो का फासला कुछ भी नहीं,
क्योंकि दिल की आवाज़ कही तो पहुंची होगी !
पर कभी सब कुछ एक मिथ की तरह धुन्ध में खो जाता है।
क्या सच है , क्या सच था ?
क्या कुछ नित्य प्रेम जैसा कुछ होता भी है ?
एहसास तो है सत्यता का, जिसने बहाय नहीं ,
कुछ अन्त निहित स्पर्श किया था !
की कुछ तो है जो मिलो की दूरी , सालो का फैसला कुछ भी नहीं लगता!
यकीं हैं की कहीं तो दिल की कही तक आवाज़ पहुंची तो होगी!

अस्मिता १०/८/


Monday, February 17, 2014

अरसा हुआ कि खुद को जाना ही नहीं और नज़रिया बदल गया.

अरसा हुआ.…
अरसा हुआ की खुद से खुद कि बात हुए।
कहीं चले जा रहे हैं बस पता का पता नहीं
वक़्त का ख्याल ही नहीं , कब कल था और कब कल हो गया !
रफ़्तार इस तरह की , के तूफ़ान भी अपनी रफ़्तार पलट कर  देखे
दिन, महीने साल, बस गुज़र रहे हैं लम्हे कि तरह!
अरसा हुआ की कहीं ठहरे ही नहीं। ....
सब कुछ बदल गया हो जैसे…
मैं भी और मैं भी
बातो बातो में बात हुए भी ज़माना गुज़र गया.....
चलते चलते पता ही नहीं चला कब रफ़्तार बदल भग्न शुरू कर दिया
अब भाग भाग , चलने का इहसास  ही भूल गये…
वही जगह यही जगह बस जरिया बदल गया।
अरसा हुआ कि खुद को जाना ही नहीं और नज़रिया बदल गया.

अस्मिता सिंह २/१८/२०१४

Thursday, August 16, 2012

सोचो तो जान के दोहरया उन भाव को जिनको कभी सोचा था दोबारा दूर से भांपे की भी नहीं!!

ज़िन्दगी जब भी  इस तरह की हकीकत सामने लाती है कभी,
हर तरह से मुह फेर की भी आयना दिखा ही जाती है !
हर उस वजह से डर लगने लगता है,
जो उस वजह को दूंढ न पाने की नाकाम कोशिश रहती है !
क्या सच है क्या मिथ , क्या ठीक है और क्या गलत,
पता ही नहीं किसके नज़रिए से देखे किसे!
कभी उन किसी से कोई वास्ता भी नहीं रहा होगा,
फिर भी उन किसी की वजह ढूंडने में इतना वक़्त लगा दिया !
शायद जब सवालो के जवाब नहीं मिलते तो ,
तो इतनी अनजानी से घुटन होने लगाती  है !
क्या सच है क्या मिथ , कौन सही है कौन गलत
पता ही नहीं किसके नज़रिए से देखे किसे!
किस वजह से ये अविदित सी तलाश है,
जो पूरी होकर भी पूरी ना हो सकी !
फिर वही मज़ाक ज़िन्दगी ने किया , या आप वोह रास्ता ढूंढा
जिसपर आप  फिर वही फैसला लिया,
कैसे कह दे इतिहास न दोहराया किसी ने
की हर जगह वही किस्से  नज़र आना इतेफाक तो नहीं,
फिर भी किस्मत को फिर से ठुकराया किसी ने
जाने कब रुके ये किस्सा कहीं पर?
सोचो  तो जान के दोहरया उन भाव को जिनको कभी सोचा था दोबारा दूर से भांपे की भी नहीं!!

- अस्मिता सिंह 08.16.2012

Friday, March 23, 2012

ये अनजान खवाहिशे , यह अनकही उमींदे

ये अनजान खवाहिशे , यह अनकही उमींदे
एक गहेरे पानी में बनी उस  चाँद की परछाई  की तरह नज़र आती हैं  ,
जो एक छोटे से पत्ते के छूने से , पानी में लहरों के साथ खो जाती हैं ..
इनका  अस्तित्व बस कुछ एक पल का छोटा सा होता है .
पर सोचो तो कुछ तो मिला होगा...
शायद पल भर की ज़िन्दगी और एक पल की पहचान!!
और फिर सबसे परे हो सबसे अनजान , कोने में छुप जाती हैं,
या कभी इतनी घबराई की दुनिया के सामने ही न आती है .. 
ये अनजान खवाहिशे, यह अनकही उमींदे !!
कभी इनको , कोने से जगाया होता ...
या  ऊपर चार दीवारों में बंद कर एक बड़ा सा ताला लगाया होता ..
 न कोई एहसास रहता  नो कोई आवाज़ आती ...
और चुप चाप अनजान, उनकाही अपने आप में समां जाती
ये महत्वहीन ,छोटी मोटी खवाहिशे , यह छोटी मोटी उमींदे ....

अस्मिता सिंह ०३.२६.२०१२

Friday, September 30, 2011

कभी इस तरह से कभी किसी तरह से ,

कभी इस तरह से कभी किसी तरह से ,
यहीं सब जो तुमसे जुदा है , हर जगह हर तरह से
हर तरह से बस और सिर्फ तुमसे जुडा है...
बातो में जो पिछले दिनों की परछाई है , हर वो धुंधला सा एहसास है
कभी किसी तरह, कभी इसी तरह से , बस और सिर्फ तुमसे जुडा है..
दिन शुरू से हर पहर के अंत तक , जो रेखाओं से जुदा है 
कभी अलक्ष्य है, कभी प्रत्यक्ष अति स्पष्ट है
इसी तरह बस इसी तरह से , सिर्फ और सिर्फ तुमसे जुडा है...
ये तुम जानते हो, ये तुम्हे एहसास भी है... ये तुमसे न कभी जुदा था, 
न कभी अप्रत्यक्ष था  , कही अनंत की तलाश में बस अलग अलग सा,
जुदा जुदा सा रहा हो .. फिर भी सिर्फ तुमसे , हर तरह से सिर्फ तुमसे जुडा है ... 
-- अस्मिता सिंह

Friday, August 19, 2011

हम छुपाते है तो सब हालlत चहरे से बयाँ हो जाते हैं...

 हम छुपाते है तो सब हालlत चहरे से बयाँ  हो जाते  हैं...
वो सब बात बता कर भी हर बात छुपा जाते हैं
कुछ हालत ऐसे की बातो में बयां नहीं होते
भाव छुपान की हर कोशिश नाकाम नज़र आती है
शब्दकोष में कुछ कमी सी महसूस होती ही क्या है...
हर अभिव्यक्क्ति अपना रास्ता निज ही ढूंढ लेती है...
और जो हालात  संभ्रम में छुपाने की कोशिश की थी 
 वोह अधूरी कोशिश बनकर रह जाती है
चहरा जो हालात बयाँ करता था.. उसपर यह नाकाम कोशिश एक और भाव लगा देती है

- अस्मिता सिंह