Tuesday, April 1, 2008

अपनी दुनिया में दास्तान गम है,,,

अनपी दुनिया में दास्तान गम है॥
किस्मत से लड़कर कुछ नही मिला ....
किस्मत से बड़कर कुछ नही मिला...
मिल जाता है हर मोड़ पर गम का टुकडा....
कम नही होता कागज़ में लिपटा हुआ गम का वो टुकडा ...
कम नही होता हवा के साथ चलता गम का वो टुकडा...
कम नही होता हर पल प्रत्बिम्ब सा साथ चलता गम का वो टुकडा....
सोचा था गम की कोई ज़िंदगी होगी... जिया है तो साथ भी छोडेगा .....
पर अब तो लगता है अंत तक साथ रहेगा ज़िंदगी से जुडा
हर पल साथ चलता गम का वो टुकडा......

अस्मिता सिंह


Tuesday, March 11, 2008

कुछ तो कहना है तुमको जो चुप रहकर भी कह देते हो...

कुछ तो कहना है तुमको जो चुप रहकर भी कह देतो हो....
हम समझते है इस तरह से की तुम्हारी हर खामोशी की एक अलग आवाज़ होती है....
और हर आवाज़ का एक अलग आभास होता है....
आज से कल का सफर , उस साथ पर निर्भर तो नही
फ़िर हर मोड़ पर यह तलाश सी क्यों रहती है .....
जब खामोश राहें है और खामोश तुम भी हो.....
फिर यह हर पल खामोशी की यह अलग आवाज़ सी क्यों रहती है....
कहीं राहों में पड़े सूखे पत्ते हवा के साथ मिलकर कुछ कह जाते हैं
और कभी... बारिश की बूंदों से भीगकर यह भी चुप चाप वहीं खमोश हो जाते हैं.....
ठीक उसी तरह ज़िंदगी कभी हवा के साथ सर सराहत की आवाज़ करती है .....
और कभी गीले खामोश पत्तो की तरह निशब्द हो जाती है.....
कुछ कहना है तुमको जो चुप रहकर भी कह देते हो.......

अस्मिता सिंह

Thursday, March 6, 2008

तुम हेर बार युहीँ चले जाते हो....

तुम हर बार यूहीं चले जाते हो....
हर इल्जाम हमारे सर छोड़ के...
इल्जाम उन बातो का जो हमने की...
और इल्जाम उन बातो का जो तुमने की....
और हम यूहीं चुप चाप सुन कर रहे जाते
हर उन बातो को....
तुम हर बार यूहीं चले जाते हो.....

अस्मिता सिंह

Tuesday, February 26, 2008

क्या ज़िंदगी है एक द्वीप की.....

पानी से घिरा हुआ... चुप चाप खड़ा रहता हू...
मैं द्वीप हू और मेरा घर पानी के बीच में है...
लहेरो से दिन रात बातें करता हू॥
कभी यह गुस्से में मुझे थपेडे
मार जाती है...
और कभी दिन रात प्यार से मुझे अपने
aanchal tale lori sunati है....