Tuesday, December 18, 2007

मेरी दो ज़िंदगी हैं....

मेरी दो ज़िंदगी हैं.... एक मेरी और एक तुम्हारी...
मेरी अपनी ज़िंदगी अपनी नही हैं...
और मेरी तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी नही है...
कुछ कहकर क्या करना है... पर लगता है चुप रहकर भी क्या करना है...
मेरी दो ज़िंदगी हैं.... एक मेरी और एक तुम्हारी...
मेरी तुम्हारी ज़िंदगी का तुम कुछ नही कर सकते...
मेरी अपनी ज़िंदगी का मैं कुछ नही कर सकती....
फिर यह कैसी ज़िंदगी है..
जो न मेरी है न तुम्हारी है....

अस्मिता सिंह

Thursday, December 6, 2007

बस एक फैसले का फासला है.....

बस एक फैसले का फासला है....
जो हर तरह से जंजीरो में बांध कर रखा है...
क्या ख्वाहशे हैं क्या सपने है.....
कि हर सपने को बस ख्वाबो में पूरा होते देखतें हैं.....
वक़्त से लड़कर भी
तो देख सकते थे पर तब वही रिश्तो ने बाँधा था
जो आज रोक कर रखें हैं.....
बस एक फैसले का फासला है....
कि वक़्त के साथ चलने कि कोशिश हर नाकाम हुई है...


अस्मिता सिंह ०६ दिसम्बर २००७

Tuesday, November 20, 2007

इतनी तनहा है ज़िंदगी कि ...

इतनी तनहा है ज़िंदगी कि ...
हर आहट कि एक अलग सी आवाज़ सुनाई देती है.....
कुछ इस तरह वक़्त गुज़रता है कि
हर आवाज़ से एक रिशता बन गया है.....
हवा कि आवाज़, पानी कि आवाज़, खिड़की कि आवाज़, दीवारों कि आवाज़....
हर उस चीज़ कि आवाज़ जो आस पास रहती है....
क्योंकी वक़्त तो इन्ही के साथ गुजरता है ...
यह हमसे बात करते हैं... और हम इनसे.....
कभी हम इन्हें अपनी दास्ताँ सुनाते है... और कभी यह हमहे अपनी कहानी बताते है.....

अस्मिता सिंह
०४ दिसम्बर २००७

Wednesday, November 14, 2007

कुछ मुलाकात अधूरी सी क्यों लगती हैं,,,,,

कुछ मुलाकात अधूरी सी क्यों लगती हैं....
इस तरफ से उस तरफ का सफर... वक़्त के साथ ठहरता हुआ लम्हा
यह अनकहीं सी वह बात पूरी सी क्यों लगती है..
क्या यही ज़िंदगी के हर मोड़ पर होता है....
वक़्त कहीं है पर लम्हा वहाँ नही होता है ...
जब वक़्त था तो लम्हों को संभाला अब हर
पल उन लम्हों की तलाश है....
जीते है कि जीना है इसलिए पर ज़िंदगी तो ज़िंदगी नही....
उन लम्हों पर पड़े कुछ सूखे पत्तो कि तरह एक खोया हुआ सा आभास है....

अस्मिता सिंह १४ नवम्बर २००७

Wednesday, September 26, 2007

कल्पनाओ की तस्वीर

नव कल्पना की धूमिल सी तस्वीर देखी है....
कभी ख्वाब में तो कभी हक़ीकत में.....
अपनी ही ख्वाबों कि तकदीर देखी है.....
क्षिति के पास तो
आसमान भी झुक जाता है.....
स्पष्टता कि रह में
धुंध कहीं पीछे रूक जाता है....
धरती के किनारे.... आसमान के सहारे॥
जो मिल जाता है...
उसकी अनजानी सी तस्वीर देखी है॥

नव कल्पना की धूमिल सी तस्वीर देखी है....
कभी ख्वाब में तो कभी हक़ीकत में.....
अपनी ही ख्वाबों कि तकदीर देखी है.....

अस्मिता सिंह

व्यर्थता एवम सार्थकता

कभी जीवन की व्यर्थता को सार्थक
बनाने की कोशिश तो करो
ज़मीन से ऊपर उठकर
चांद पर जाने की कोशिश तो करो...
क्या हस्ती है हवाओं कि अगर इरादे बुलंद हो
हवाओं का रुख मोड़ने की कोशिश तो करो...
ज़मीन पर चल सकते हो तो क्यों नही मानते
आसमान पर भी घर बनओगे
झुक जाएगा आसमान भी ......
कभी सर ऊपर उठाने कि कोशिश तो करो......

अस्मिता सिंह .....
१५/०३/२००२ (भूली बिसरी यादें)

Monday, September 24, 2007

क्लिष्ट जीवन

क्लिष्ट जीवन कि क्या दास्ताँ होगी ..
कहीं छाव हैं तो कहीं गहरा पानी है...
शायद एक मज़बूरी है और यही अन कहीं सी कहानी है॥

सच है कि सच को छुपाना कितना कठिन है...
और सच है कि सच को अपनाना कितना कठिन है...

जिन्दगी अक्सर दो रहो पर लाकर छोड़ देती है...
एक जमीर कि आवाज़ और एक ज़िमेदारियों कि आवाज़...
अपने ज़मीर का गला घोट कर अगर ज़िमेदारी उठाओ॥
तो वोह महज एक बोझ बनकर रह जाती है....

अस्मिता सिंह २५ सितंबर २००७

Wednesday, September 12, 2007

यह ठहरा हुआ ज़रा रुका हुआ सा लम्हा....


तुम नही हो साथ तो यह लम्हा चल सा नही रहा है....

रूक गया है वही आगे चल सा नही रहा है...

वोह ख़ुशी कहॉ खोजे, जो सिर्फ और सिर्फ उन लम्हों के साथ क़ैद हो गई है...

तुम नही साथ तो वोह ख़ुशी ठहर सी गयी है ...

खामोश हो गयी है कहीं कुछ बोल सी नही रही है...

यूं तो हसते थे तो सालो लंबी खामोशी टूट जाती थे...

तुम नही साथ तो वोह हंसी चुप सी हो गयी है...

खूद एक लंबी लकीर सी बन गयी है...

उन रेखाओं में कैसे खोजे उस हंसी को....
अस्मिता सिंह
Sept १३

क्या हुआ कि जिन्दगी ठहर ना सकी.....


क्या हुआ कि जिन्दगी ठहर ना सकी....
कुछ पल जो याद आये वो ही बहुत है...

Friday, July 13, 2007

कहां से शुरू हुआ, कहां रूक गया.....


कहां से शुरू हुआ, कहां रूक गया.....

वो लमहा वो पल.... कहीं साथ चला कहीं छुप गया....

हर घड़ी , हर पल नए रंग बदलती ज़िन्दगी...

पर कहीं तो ठहरी थी ... और अब भी वही खडी है

चुपके चुपके धीमे धीमे साथ साथ चलती... वो सहमी बेचारी सी छुपकर

खडी ज़िन्दगी.......
हज़ार वजह भी धुंधली पड़ जाती है॥ जब छुप कर आवाज़ देती है

यह पीछे खडी थी जो ज़िन्दगी......

कहां से शुरू हुआ, कहां रूक गया.....
वो लमहा वो पल.... कहीं साथ चला कहीं छुप गया....

साथ आया है अब तक वो पल वोह लमहा....

अब चुप चुप से ना जाने कहां खड़ा है और कहां छुप गया......


--------------------अस्मिता सिंह

कहने को साथ अपने एक दुनिया चलती है ....

कहने को साथ अपने एक दुनिया चलती है॥
पर छुपकर इस दिल में तनहाई पलती है....

जिसने भी कहा है सच कहा है...

Friday, July 6, 2007

Life is Beautiful .....


भावनाओ का भंवर है , शब्दो कि तलवार है ,

कहीं ख़ुशी है तो कहीँ ग़मों का पहाड़ है ,

कहीं कहती है, यह दुनिया जीने का नाम प्यार है,

और कहीँ प्यार से जीना ही दुशवार है,

क्या यही यह जीवन , यह संसार है,

भावनाओ का भंवर है, शब्दो कि तलवार है।


---- अस्मिता सिंह

खामोश पानी


शांत होकर भी कितना खुछ कह जाता है ,

यह हेर वक़्त चुप रहता खामोश पानी

कभी किनारो से टकरा केर, लहरो को अपनी आवाज़ बनाकर,

चुपके से कुछ कह जाता है॥ यह हेर वक़्त चुप रहता खामोश पानी॥


और कभी आकाश को चूमता हुआ, झरने को अपनी आवाज़ बनाकर

अपने से ही बात करता हुआ, कुछ ना कह कर

भी कितना कुछ कह जात है , यह हर वक़्त चुप रहता खामोश पानी॥


और कभी कहते कहते ही चुप हो जाता है, यह हेर वक़्त चुप रहता खामोश पानी........


------अस्मिता सिंह



Monday, July 2, 2007

Everything has a reason....


टूटती उम्मीदों के बावजूद..
बार-बार टूटती उम्मीदों के बावजूद उम्मीदों से भरी है यह दुनिया
गहरे अंधेरे को चीर कर ही निकलता है सूर्य
बिखरती है भोर की लाली
चहचहाती हैं चिडि़यां गूंजते हैं
एक नई सुबह के गीत
बावजूद बियावान अंधेरे के भरती हैं कुलांचें हिरणी उछलते हैं खरगोश
एक अंजानें भय के बावजूद अतल से लिए हुए पिघलता गर्म लावा फटता है
ज्वालामुखी दब जाती हैं बस्तियां और आशाएं-आकांक्षाएं भी लेकिन धरती और भी उर्वर हो उठती है एक अभिनव सृजन में संलग्न आशाओं के खिलाते हुए
इंद्रधनुष उम्मीदों से भरी दुनिया का यह चक्र गतिमान है अनवरत

रमेशचंद्र पंत
http://www.jagran.com/sahitya/Inner.aspx?idarticle=1027&idcategory=2

Friday, June 22, 2007

इति सरल है अथ कठिन है; हर शिखर का पथ कठिन है। पालकर मन में मनोरथ, त्यागना स्वारथ कठिन है। जीतना ईश्वर सहज पर, जीतना मन्मथ कठिन है। चाह गंगा अवतरण की, किंतु भागीरथ कठिन है। छल कपट के राजपथ पर, ढूंढना सत्पथ कठिन है। राजरति की बदनजर से, बच सकेगी नथ कठिन है। हों न अब मृदु भावनाएं, खून से लथपथ, कठिन है। इस अंधेरे से गुजरना सूर्य का भी रथ, कठिन है।
चंद्रभान भारद्वाज

Tuesday, May 29, 2007

Jo beet gayi so baat gayi

Jo beet gayi so baat gayi - By Dr. Harivansh Rai Bachan

I really wonder whats the difference in a normal persona and a Writer or Poet.. when I read some creations like following I understand it...
The philosphy of life... Life can be compared with anything.. anything.. its every activity, its every action is somehow simulated somewhere .. Here in following I like the motivation !!! Its about giving an approach to think beyond what happend.
Read this:

http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/bachchan/beetgayi.htm

Friday, May 25, 2007

Silent Waters- About Movie!!!

Everyone has different criteria to rate anything.. I got a chance to view this movie recently. I liked the movie....
There are so many movies made on India Pakistan partition.. But this is story based on situation at Pak side!!
One must see this movie.. You can find it over the net.. Its a small movie.. But good..