Monday, February 17, 2014

अरसा हुआ कि खुद को जाना ही नहीं और नज़रिया बदल गया.

अरसा हुआ.…
अरसा हुआ की खुद से खुद कि बात हुए।
कहीं चले जा रहे हैं बस पता का पता नहीं
वक़्त का ख्याल ही नहीं , कब कल था और कब कल हो गया !
रफ़्तार इस तरह की , के तूफ़ान भी अपनी रफ़्तार पलट कर  देखे
दिन, महीने साल, बस गुज़र रहे हैं लम्हे कि तरह!
अरसा हुआ की कहीं ठहरे ही नहीं। ....
सब कुछ बदल गया हो जैसे…
मैं भी और मैं भी
बातो बातो में बात हुए भी ज़माना गुज़र गया.....
चलते चलते पता ही नहीं चला कब रफ़्तार बदल भग्न शुरू कर दिया
अब भाग भाग , चलने का इहसास  ही भूल गये…
वही जगह यही जगह बस जरिया बदल गया।
अरसा हुआ कि खुद को जाना ही नहीं और नज़रिया बदल गया.

अस्मिता सिंह २/१८/२०१४