Friday, March 23, 2012

ये अनजान खवाहिशे , यह अनकही उमींदे

ये अनजान खवाहिशे , यह अनकही उमींदे
एक गहेरे पानी में बनी उस  चाँद की परछाई  की तरह नज़र आती हैं  ,
जो एक छोटे से पत्ते के छूने से , पानी में लहरों के साथ खो जाती हैं ..
इनका  अस्तित्व बस कुछ एक पल का छोटा सा होता है .
पर सोचो तो कुछ तो मिला होगा...
शायद पल भर की ज़िन्दगी और एक पल की पहचान!!
और फिर सबसे परे हो सबसे अनजान , कोने में छुप जाती हैं,
या कभी इतनी घबराई की दुनिया के सामने ही न आती है .. 
ये अनजान खवाहिशे, यह अनकही उमींदे !!
कभी इनको , कोने से जगाया होता ...
या  ऊपर चार दीवारों में बंद कर एक बड़ा सा ताला लगाया होता ..
 न कोई एहसास रहता  नो कोई आवाज़ आती ...
और चुप चाप अनजान, उनकाही अपने आप में समां जाती
ये महत्वहीन ,छोटी मोटी खवाहिशे , यह छोटी मोटी उमींदे ....

अस्मिता सिंह ०३.२६.२०१२