Thursday, March 3, 2011

की किस तरह हवा के साथ बहते तिनके को कोई तो ठहराव मिले

की किस तरह हवा के साथ बहते तिनके को कोई तो ठहराव मिले...
इतनी दूर निकल आये की याद नहीं सफ़र शुरू कहाँ से किया था
की किस तरह पानी में मिलती जा रही तरंग को को उसका अपना एक बहाव मिले...
देखा तो अपने ही पल चिन्ह पहचाने में नहीं आये 
किसी के रास्तो पर गुमसुम से चले जा रहे थे ...
की आज पीछे नज़र घुमाई है  और किस तरह आप में धूमिल होते अहसास को कोई पहचाना सा भाव मिले..
अजीब अवलंबित सफ़र में भागते हमसफ़र की तरह एक लम्बा सफ़र तय तो केर लिया है  ...
की उसे भी आज रुक कर एक नयी हवा का हल्का सा अनुभाव मिले..
की किस तरह हवा के साथ बहते तिनके को कोई तो ठहराव मिले...

-अस्मिता सिंह
०३.०३.२०११