Friday, June 18, 2010

अरसे बाद जब कलम उठाई तो

अरसे बाद जब कलम उठाई तो लगा की शायद
शब्दों  से रिश्ता टूट गया था और वोह हमे पहचाने गी की नहीं ...
पर कुछ रिश्ते शायद इस जनम के होते ही नहीं हैं
वोह तो कहीं से बस बने बनाये आते हैं...
इधर उधर हर जगह बिखरे  शब्दों ने हम पहचाना भी और फिर से अपना बना लिया..
कुछ देर खामोश खड़े रहकर सोचा तो होगा इस इंसानी मनोभाव के बारे में ...
पर यकीन मानो कुछ ही देर में उन्होंने हमे फिर से अपना लिया ...
फिर जुड़ गए सिलिसले ऐसे ... हमें अपनी सूनी राहो  का हम सफ़र मिल गया हो जैसे ...
कितना अजीब सा नियम है प्रकृति का.. इंसान रिश्ते बनाने के लिये सिर्फ इंसानो को ढूंढता  है...
अगर गौर से देखे तो रिश्ता सिर्फ एहसास से बनते है...
और रिश्ता ऐसे हो तो बात ही क्या है...
आज बड़ा अकेलापन सा लग रहा था , एक घबराहट सी थी.. आस पास सन्नाटा सा था...
और फिर याद आया अपना रिश्ता इन शब्दों से और सब वैसे का वैसे ही लगने लगा जैसे अरसा पहले था...