Tuesday, March 11, 2008

कुछ तो कहना है तुमको जो चुप रहकर भी कह देते हो...

कुछ तो कहना है तुमको जो चुप रहकर भी कह देतो हो....
हम समझते है इस तरह से की तुम्हारी हर खामोशी की एक अलग आवाज़ होती है....
और हर आवाज़ का एक अलग आभास होता है....
आज से कल का सफर , उस साथ पर निर्भर तो नही
फ़िर हर मोड़ पर यह तलाश सी क्यों रहती है .....
जब खामोश राहें है और खामोश तुम भी हो.....
फिर यह हर पल खामोशी की यह अलग आवाज़ सी क्यों रहती है....
कहीं राहों में पड़े सूखे पत्ते हवा के साथ मिलकर कुछ कह जाते हैं
और कभी... बारिश की बूंदों से भीगकर यह भी चुप चाप वहीं खमोश हो जाते हैं.....
ठीक उसी तरह ज़िंदगी कभी हवा के साथ सर सराहत की आवाज़ करती है .....
और कभी गीले खामोश पत्तो की तरह निशब्द हो जाती है.....
कुछ कहना है तुमको जो चुप रहकर भी कह देते हो.......

अस्मिता सिंह

Thursday, March 6, 2008

तुम हेर बार युहीँ चले जाते हो....

तुम हर बार यूहीं चले जाते हो....
हर इल्जाम हमारे सर छोड़ के...
इल्जाम उन बातो का जो हमने की...
और इल्जाम उन बातो का जो तुमने की....
और हम यूहीं चुप चाप सुन कर रहे जाते
हर उन बातो को....
तुम हर बार यूहीं चले जाते हो.....

अस्मिता सिंह