Tuesday, November 20, 2007

इतनी तनहा है ज़िंदगी कि ...

इतनी तनहा है ज़िंदगी कि ...
हर आहट कि एक अलग सी आवाज़ सुनाई देती है.....
कुछ इस तरह वक़्त गुज़रता है कि
हर आवाज़ से एक रिशता बन गया है.....
हवा कि आवाज़, पानी कि आवाज़, खिड़की कि आवाज़, दीवारों कि आवाज़....
हर उस चीज़ कि आवाज़ जो आस पास रहती है....
क्योंकी वक़्त तो इन्ही के साथ गुजरता है ...
यह हमसे बात करते हैं... और हम इनसे.....
कभी हम इन्हें अपनी दास्ताँ सुनाते है... और कभी यह हमहे अपनी कहानी बताते है.....

अस्मिता सिंह
०४ दिसम्बर २००७

Wednesday, November 14, 2007

कुछ मुलाकात अधूरी सी क्यों लगती हैं,,,,,

कुछ मुलाकात अधूरी सी क्यों लगती हैं....
इस तरफ से उस तरफ का सफर... वक़्त के साथ ठहरता हुआ लम्हा
यह अनकहीं सी वह बात पूरी सी क्यों लगती है..
क्या यही ज़िंदगी के हर मोड़ पर होता है....
वक़्त कहीं है पर लम्हा वहाँ नही होता है ...
जब वक़्त था तो लम्हों को संभाला अब हर
पल उन लम्हों की तलाश है....
जीते है कि जीना है इसलिए पर ज़िंदगी तो ज़िंदगी नही....
उन लम्हों पर पड़े कुछ सूखे पत्तो कि तरह एक खोया हुआ सा आभास है....

अस्मिता सिंह १४ नवम्बर २००७