Friday, July 13, 2007

कहां से शुरू हुआ, कहां रूक गया.....


कहां से शुरू हुआ, कहां रूक गया.....

वो लमहा वो पल.... कहीं साथ चला कहीं छुप गया....

हर घड़ी , हर पल नए रंग बदलती ज़िन्दगी...

पर कहीं तो ठहरी थी ... और अब भी वही खडी है

चुपके चुपके धीमे धीमे साथ साथ चलती... वो सहमी बेचारी सी छुपकर

खडी ज़िन्दगी.......
हज़ार वजह भी धुंधली पड़ जाती है॥ जब छुप कर आवाज़ देती है

यह पीछे खडी थी जो ज़िन्दगी......

कहां से शुरू हुआ, कहां रूक गया.....
वो लमहा वो पल.... कहीं साथ चला कहीं छुप गया....

साथ आया है अब तक वो पल वोह लमहा....

अब चुप चुप से ना जाने कहां खड़ा है और कहां छुप गया......


--------------------अस्मिता सिंह

कहने को साथ अपने एक दुनिया चलती है ....

कहने को साथ अपने एक दुनिया चलती है॥
पर छुपकर इस दिल में तनहाई पलती है....

जिसने भी कहा है सच कहा है...

Friday, July 6, 2007

Life is Beautiful .....


भावनाओ का भंवर है , शब्दो कि तलवार है ,

कहीं ख़ुशी है तो कहीँ ग़मों का पहाड़ है ,

कहीं कहती है, यह दुनिया जीने का नाम प्यार है,

और कहीँ प्यार से जीना ही दुशवार है,

क्या यही यह जीवन , यह संसार है,

भावनाओ का भंवर है, शब्दो कि तलवार है।


---- अस्मिता सिंह

खामोश पानी


शांत होकर भी कितना खुछ कह जाता है ,

यह हेर वक़्त चुप रहता खामोश पानी

कभी किनारो से टकरा केर, लहरो को अपनी आवाज़ बनाकर,

चुपके से कुछ कह जाता है॥ यह हेर वक़्त चुप रहता खामोश पानी॥


और कभी आकाश को चूमता हुआ, झरने को अपनी आवाज़ बनाकर

अपने से ही बात करता हुआ, कुछ ना कह कर

भी कितना कुछ कह जात है , यह हर वक़्त चुप रहता खामोश पानी॥


और कभी कहते कहते ही चुप हो जाता है, यह हेर वक़्त चुप रहता खामोश पानी........


------अस्मिता सिंह



Monday, July 2, 2007

Everything has a reason....


टूटती उम्मीदों के बावजूद..
बार-बार टूटती उम्मीदों के बावजूद उम्मीदों से भरी है यह दुनिया
गहरे अंधेरे को चीर कर ही निकलता है सूर्य
बिखरती है भोर की लाली
चहचहाती हैं चिडि़यां गूंजते हैं
एक नई सुबह के गीत
बावजूद बियावान अंधेरे के भरती हैं कुलांचें हिरणी उछलते हैं खरगोश
एक अंजानें भय के बावजूद अतल से लिए हुए पिघलता गर्म लावा फटता है
ज्वालामुखी दब जाती हैं बस्तियां और आशाएं-आकांक्षाएं भी लेकिन धरती और भी उर्वर हो उठती है एक अभिनव सृजन में संलग्न आशाओं के खिलाते हुए
इंद्रधनुष उम्मीदों से भरी दुनिया का यह चक्र गतिमान है अनवरत

रमेशचंद्र पंत
http://www.jagran.com/sahitya/Inner.aspx?idarticle=1027&idcategory=2