Friday, March 3, 2017

कुछ दूरियां

जिस शिद्दत से चाह पाने की रहती है
दूरियां पाने के जूनून को बहाल रखती हैं..
सामने आकर कुछ वक़्त सा ठहर जाता
बरसो की बाते एक ख़ामोशी में बदल जाती है...
और जाने के बाद रह जाती हैं वह अधूरी सी कोशिशें

ये हाथ की तक़्दीरों कोई पढ़कर बताये..
जिसे लकीरो में लिखा  ही नहीं , उसी से अनंत रिश्ता जोड़ दिया।
नित्यता निज के संयोग की रही बस..
जो दूरियों में भी अनन्त रिश्ता बनाये जाती हैं..

किसी की इबादतों के आगे शायद तक़दीर भी झुकती नज़र आती है..
हर वो पल जो साथ नहीं गुजरात है..
वह इंतज़ार जो खुद से खुद का बनाता है.. .
वही बेखुदी एहसासों को और करीब ले आती है..

विधिवत जो खेंचता है दूर,
ज़मीं पर बने बंधनो से जो बंधा  है मजबूर..
कही कोई मरज़ी कुछ और ही रही होगी..
वरना इस करि का येह संयोग न मिलता..

-- अस्मिता सिंह
३. ३ २०१७