Wednesday, September 26, 2007

कल्पनाओ की तस्वीर

नव कल्पना की धूमिल सी तस्वीर देखी है....
कभी ख्वाब में तो कभी हक़ीकत में.....
अपनी ही ख्वाबों कि तकदीर देखी है.....
क्षिति के पास तो
आसमान भी झुक जाता है.....
स्पष्टता कि रह में
धुंध कहीं पीछे रूक जाता है....
धरती के किनारे.... आसमान के सहारे॥
जो मिल जाता है...
उसकी अनजानी सी तस्वीर देखी है॥

नव कल्पना की धूमिल सी तस्वीर देखी है....
कभी ख्वाब में तो कभी हक़ीकत में.....
अपनी ही ख्वाबों कि तकदीर देखी है.....

अस्मिता सिंह

व्यर्थता एवम सार्थकता

कभी जीवन की व्यर्थता को सार्थक
बनाने की कोशिश तो करो
ज़मीन से ऊपर उठकर
चांद पर जाने की कोशिश तो करो...
क्या हस्ती है हवाओं कि अगर इरादे बुलंद हो
हवाओं का रुख मोड़ने की कोशिश तो करो...
ज़मीन पर चल सकते हो तो क्यों नही मानते
आसमान पर भी घर बनओगे
झुक जाएगा आसमान भी ......
कभी सर ऊपर उठाने कि कोशिश तो करो......

अस्मिता सिंह .....
१५/०३/२००२ (भूली बिसरी यादें)

Monday, September 24, 2007

क्लिष्ट जीवन

क्लिष्ट जीवन कि क्या दास्ताँ होगी ..
कहीं छाव हैं तो कहीं गहरा पानी है...
शायद एक मज़बूरी है और यही अन कहीं सी कहानी है॥

सच है कि सच को छुपाना कितना कठिन है...
और सच है कि सच को अपनाना कितना कठिन है...

जिन्दगी अक्सर दो रहो पर लाकर छोड़ देती है...
एक जमीर कि आवाज़ और एक ज़िमेदारियों कि आवाज़...
अपने ज़मीर का गला घोट कर अगर ज़िमेदारी उठाओ॥
तो वोह महज एक बोझ बनकर रह जाती है....

अस्मिता सिंह २५ सितंबर २००७

Wednesday, September 12, 2007

यह ठहरा हुआ ज़रा रुका हुआ सा लम्हा....


तुम नही हो साथ तो यह लम्हा चल सा नही रहा है....

रूक गया है वही आगे चल सा नही रहा है...

वोह ख़ुशी कहॉ खोजे, जो सिर्फ और सिर्फ उन लम्हों के साथ क़ैद हो गई है...

तुम नही साथ तो वोह ख़ुशी ठहर सी गयी है ...

खामोश हो गयी है कहीं कुछ बोल सी नही रही है...

यूं तो हसते थे तो सालो लंबी खामोशी टूट जाती थे...

तुम नही साथ तो वोह हंसी चुप सी हो गयी है...

खूद एक लंबी लकीर सी बन गयी है...

उन रेखाओं में कैसे खोजे उस हंसी को....
अस्मिता सिंह
Sept १३

क्या हुआ कि जिन्दगी ठहर ना सकी.....


क्या हुआ कि जिन्दगी ठहर ना सकी....
कुछ पल जो याद आये वो ही बहुत है...